आम लोगों को मिले स्वस्थ रहने का अधिकार


किसी भी समाज में अगर ईश्वर के जैसा या उसके बराबर ही आदर और सम्मान दिलाने वाला अगर कोई व्यवसाय है तो उसमें मेडिकल और उससे जुड़े वे सब लोग आते हैं जो एक तरह से मनुष्य को बीमारी, दुर्घटना या किसी प्राकृतिक आपदा में फंसे लोगों की जीवन रक्षा के लिए जाने जाते हैं। इनमें डॉक्टर, नर्स इंसान के रक्षक और अस्पताल, डिस्पेन्सरी से लेकर दवाइयों की दुकान बीमार का इलाज करने के साधन के रूप में माने जाते हैं। हरेक व्यवसाय में आर्थिक लाभ-हानि का जो बही खाता चलता है, वह मेडिकल व्यवसाय में नहीं रखा जा सकता और इसीलिए इसे सेवा का जरिया समझा जाता रहा है। आज स्थिति लगभग उलटी हो गयी है और इसे भी उसी तरह धन लाभ कमाने का जरिया मानने का चलन शुरू हो गया है जैसा कि दूसरे काम-धंधों में माना जाता है। इसका एक उदाहरण यह है कि पहले उपभोक्ता संरक्षण कानून में स्वास्थ्य की देखभाल करने को अन्य सेवाओं की भाँति सेवा के दायरे में रखा गया था और यदि मेडिकल सेवा में कोई खामी होती थी तो इस कानून के दायरे में दण्ड दिए जाने का प्रावधान था लेकिन अब ऐसा नहीं कर सकते। पीड़ित को सामान्य मुकद्दमे की तरह विभिन्न अदालतों में न्याय की गुहार लगानी होगी। 
मेडिकल व्यवसाय में नैतिकता 
एक सर्वे के मुताबिक इस व्यवसाय में काम करने वाले डॉक्टर अनेक तरह के टेस्ट करने वाली लेबोरेटरी से चालीस से साठ प्रतिशत तक किकबैक पाते हैं जो उन्हें मरीज की जेब से निकलवाने की काबलियत के रूप में मिलता है। इसमें जरूरी टेस्ट भी मर्ज को दूर करने के लिए जरूरी बताकर मरीज को उन्हें करवाने के लिए मजबूर किया जाता है। अब इन टेस्टों का नाम भी है और इन्हें कराने के लिए मरीज का जो खून, यूरीन, बलगम आदि लिया जाता है, वह नालियों में बहा दिया जाता है। इन टेस्टों के नाम भी हैं और इन्हें नाली या सिंक कहा जाता है। किसी भी लैबोरेटरी में किसी कर्मचारी को भरोसे में लेकर यह सच उगलवाया जा सकता है।  तीस से चालीस प्रतिशत तक डॉक्टर को किसी भारी फीस लेने वाले स्पेशलिस्ट को रेफर करने के लिए मिलता है और लगभग इतना ही अस्पताल की सेवाओं में से मिलता है। इसके साथ ही बड़े नामी-गिरामी अस्पतालों के पेनल पर बने रहने के लिए डॉक्टर को उनमें मरीजों को भेजने के लिए अपने निर्धारित कोटे को पूरा करना होता है, तब ही वह उस अस्पताल के पैनल पर रह सकता है। इन अस्पतालों में मरीज के आने के बाद उसे तीन-चार दिन तक ऑब्जर्वेशन के नाम पर आई सी यू में रखा जाता है, जहाँ जरूरत न भी हो तो भी वेंटिलेटर पर रखा जाता है, डाइलिसिस जैसी चिकित्सा और महँगे इंजेक्शन और दवाइयाँ दी जाती हैं जिनकी कीमत उन पर छपे अधिकतम मूल्य से कई गुना ज्यादा होती है। हर उस चीज को मरीज के बिल में जोड़ा जाता है जो उसे दी जाती है चाहे सिरंज, पट्टी, बैंडिज कुछ भी हो। एक और गोरखधंधा चलता है जो आमतौर से डॉक्टर दम्पति चलाते हैं। यह वन मैन शो होता है। दम्पति में से एक डॉक्टर की भूमिका निबाहता है और दूसरा अपने ही घर के कुछ कमरों को नर्सिंग होम की शक्ल देता है, इसमें दसवीं फेल नर्स, ढीली या कसी हुई वर्दी पहने अनपढ़ वार्ड बाय होते हैं। नर्स रिसेप्शन से लेकर इंजेक्शन लगाने, ग्लूकोस चढ़ाने से लेकर ऑपरेशन सहायक तक का काम करती है और रात को आई.स.यू. के बाहर भी बैठती है ताकि अगर कोई इमरजेंसी हो जाए तो फौरन दूसरी मंजिल पर रहने वाले डॉक्टर दम्पति में से किसी एक को बुला सके। यहाँ तक के किस्से हैं कि मरीज की मृत्यु होने के बाद भी नकली ऑपरेशन का ढोंग रचकर मोटी रकम वसूली जाती है।  इस तरह के क्लीनिक और नर्सिंग होम में जबरदस्ती सर्जरी से लेकर स्त्रियों की बच्चेदानी यह कहकर निकाल दी जाती है कि फायब्राड हो गए हैं जबकि ये प्रत्येक महिला में होते हैं। इसी तरह कोसमेटिक ट्रीटमेंट के नाम पर फेशियल, वैक्सिंग करने की बात कहकर त्वचा का इतना बुरा हाल कर देते हैं जिससे जान तक खतरे में पड़ सकती है। अब क्योंकि चिकित्सा में लापरवाही का प्रावधान ही कानून में नहीं होगा तो फिर कैसे रोगी और उसके परिवार वाले अपने बचाव में कुछ कर सकेंगे, यह हमारे नीति निर्धारण करने वालों के लिए सोचने की ही नहीं बल्कि इस पर कुछ ठोस नियम कानून बनाने की भी जरूरत को उजागर करता है। 
स्वस्थ रहने का अधिकार 
हमारे देश में चिकित्सा व्यवसाय की सबसे पहली कड़ी सरकारी अस्पतालों की है जो अनेक प्रशासनिक खामियों के बावजूद सामान्य व्यक्ति की बीमारी की अवस्था में पहली पसंद हैं। इनमें भीड़ ही इतनी होती है कि डॉक्टर के मन में मरीज का आर्थिक शोषण करने की बात ही नहीं आ पाती, दूसरे ज्यादातर बीमार इलाज के लिए ही पैसों की कमी से जूझते रहते हैं। जो सम्पन्न होते हैं, वे अपने राजनीतिक या सामाजिक रुतबे की बदौलत यहाँ वी.आई.पी. की तरह अपनी चिकित्सा कराने आते हैं और कभी-कभी जरूरत न होने पर भी वार्ड में टिके रहते हैं और मुफ्त में महँगी से महँगी सुविधाओं का उपभोग करते रहते हैं। दूसरी कड़ी है चिकित्सा को शुद्ध व्यवसाय और जबरदस्त मुनाफे के धंधे के रूप में देखने वाले बड़े व्यावसायिक और औद्योगिक घरानों द्वारा स्थापित फाइव स्टार अस्पतालों की जहाँ या तो वे लोग इलाज कराने जाते हैं जिनके पास पैसा फैंक कर तमाशा देखने की ताकत है या फिर वे जिनकी बीमारी का खर्च बीमा कम्पनियाँ चुकाती हैं। आम आदमी या थोड़ी बहुत हैसियत रखने और चिकित्सा के खर्च का जुगाड़ कर सकने वाला इनमें चला गया तो उसकी हालत गले में फंसी हड्डी की तरह हो जाती है जो न निगलते बनती है और न उगलते। तीसरी कड़ी है उन धर्मार्थ और शुद्ध सेवा करने की नियत से खोले गए चिकित्सा संगठनों और संस्थानों की जो लगभग मुफ्त इलाज की सुविधाएँ देते हैं। इनकी संख्या बहुत कम है लेकिन इनमें चिकित्सा के उच्चतम पैमानों का पालन किया जाता है और कुछ की ख्याति तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी है। एक चौथी कड़ी भी है जो झोलाछाप डाक्टरों की है, झाड़ फूंक, गंडे ताबीज , भूत प्रेत के डर जैसी बातों से इलाज करने के बहाने लोगों को ठगने का काम करते हैं।  इन सब परिस्थितियों के कारण क्या यह जरूरी नहीं है कि देश में प्रत्येक नागरिक को स्वस्थ रहने का अधिकार मिले और इसके लिए सभी राजनीतिक दल एक स्वर से सरकार से कानून बनाने की माँग करें जिसका मसौदा ऊपर कही गयी चारों कड़ियों तथा अन्य वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाये ? 
दुनिया का कोई भी देश अस्वस्थ, बीमार और कमजोर नागरिकों के बल पर तरक्की नहीं कर सकता, इसलिए स्वस्थ रहने को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले और सभी के लिए एक जैसी चिकित्सा सुविधाएँ हों और इसके लिए आंदोलन भी करना पड़े तो उससे हिचकना नहीं चाहिए क्योंकि यह जनहित का मुद्दा है। (भारत)